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माणा भारत का पहला गांव, यह खूबसूरत गांव उत्तराखंड की सीमा पर स्थित है, माणा गांव को पहले उत्तर दिशा में उत्तराखंड और भारत के आखिरी गांव के रूप में जाना जाता था, लेकिन अब इसे बदलकर पहला गांव कहा जाता है। चूँकि यह चीन की सीमा से शुरू होने वाला पहला गाँव है। इस गांव का उल्लेख त्रेतायुग से संबंधित सन्दर्भों में मिलता है। इसका पौराणिक नाम मणिभद्र (मणिभद्रपुर) बताया जाता है।

प्रकृति प्रेम के कारण इस गांव की वादियां बेहद खूबसूरत हैं। यह गांव इतिहास प्रेमियों के साथ-साथ प्राकृतिक सुंदरता को पसंद करने वाले पर्यटकों को भी बहुत भाता है। यह गांव महाभारत काल का है। क्योंकि यहीं से पांडवों ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था।

बद्रीनाथ आए तो माणा की ख़ूबसूरती देखे बिना नहीं जाए

ऐसा कहा जाता है कि महाभारत के महान युद्ध के बाद जब पांडव स्वर्ग जा रहे थे। उन्होंने इस जगह का दौरा किया। कहा जाता है कि पांडव इसी मार्ग से प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर अलकापुरी गए थे। कहा जाता है कि अब कुछ लोग इसे स्वर्ग जाने का रास्ता मान लेते हैं और छुपकर चले जाते हैं। माणा, उत्तराखंड के पर्वतीय हिमालय में बद्रीनाथ से लगभग तीन किमी आगे समुद्र तल से लगभग 18,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। भारत-तिब्बत सीमा से लगे इस गांव की सांस्कृतिक विरासत न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि यह अपनी अनूठी परंपराओं और वहां रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है।

यहां “रोंगपा” जनजाति और “भोटिया” जनजाति के लोग निवास करते हैं। मैना के साथ-साथ मलारी भी एक प्राचीन विल्केज है जो ऐतिहासिक स्थल से समृद्ध है। बद्रीनाथ से थोड़ी ही दूर गुप्त गंगा (सरस्वती) और अलकनंदा के संगम पर स्थित इस गांव के बारे में पहले लोग कम जानते थे, लेकिन अब सरकार ने यहां तक ​​पक्की सड़क बना दी है। उत्तराखंड का ये गांव देश की सीमा सुरक्षा के लिहाज से भी अहम है।

अब पर्यटक आसानी से इस गांव का दौरा कर सकते हैं और उनकी संख्या भी अब पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है। भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित इस गांव के आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें व्यास गुफा, गणेश गुफा, द्रौपदी मंदिर, सरस्वती मंदिर, भीम ब्रिज, वसुधारा झरना आदि शामिल हैं।

माना में जीवन आसान नहीं है, यहाँ साल भर ठंड रहती है लेकिन यहाँ सर्दियाँ बहुत कठोर होती हैं। छह माह तक यह क्षेत्र केवल बर्फ से ढका रहता है। यही कारण है कि यहां की ऊंची हिमालय पर्वत चोटियां बिल्कुल खड़ी और सूखी हैं। सर्दी शुरू होने से पहले यहां के ग्रामीण नीचे स्थित चमोली जिले के गांवों में रहते हैं। यहां के लोग मौसम के हिसाब से घर बदलते हैं।और जैसे ही गर्मी या बर्फ पिघलना शुरू होती है तो विदेशों से पर्यटक यहां आने लगते हैं। और गाँव वाले अपने ऊँचे पहाड़ों पर चले जाते हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां का एकमात्र इंटर कॉलेज छह महीने माणा गांव में और छह महीने चमोली में चलता है। हालाँकि यह पूरा क्षेत्र वर्ष भर ठंडा रहता है, फिर भी यहाँ की भूमि को बंजर नहीं कहा जा सकता। अप्रैल-मई में जब यहां बर्फ पिघलती है तो यहां की हरियाली देखने लायक होती है। यहां की मिट्टी आलू के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है।

माणा गांव में घूमने लायक कई ऐतिहासिक जगहें हैं। यदि आप गांव से ऊपर की ओर चढ़ते हैं, तो आप गणेश गुफा देख सकते हैं और इसके विपरीत आप व्यास गुफा देख सकते हैं। व्यास गुफा के बारे में कहा जाता है कि इसी स्थान पर वेदव्यास ने भगवान गणेश को महाभारत की रचना की थी और उन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित भी किया था। व्यास गुफा (व्यास गुफा) और गणेश गुफा का यहां होना इस किंवदंती को सिद्ध करता है कि महाभारत और पुराण लिखते समय व्यासजी बोलते थे और गणेशजी लिखते थे। व्यास गुफा गणेश गुफा से भी बड़ी है। गुफा में प्रवेश करते ही एक छोटी सी चट्टान दिखाई देती है। इस शिला पर वेदों का अर्थ प्राकृत भाषा में लिखा हुआ है।

यहां गुप्त रूप से गायब होती है सरस्वती नदी जिसपर भीम ने बना दिया पुल

माणा गांव के पास भीमपुल है। कहा जाता है कि जब पांडव इसी मार्ग से अलकापुरी गए थे। वहाँ एक जगह है जहाँ वे पहाड़ी को पार नहीं कर सकते। तब भीम ने पुल बनाने के लिए एक बड़ी शिला खींची। तभी से इसे भीम पुल कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि अब भी कुछ लोग इस जगह को स्वर्ग जाने का रास्ता समझ लेते हैं और छिपकर चले जाते हैं। स्थानीय लोगों ने यहां भीम का एक मंदिर भी बनाया है।

वसुधारा: इस रास्ते से आगे बढ़ें तो करीब पांच किमी. पर्यटक यहां पैदल चलकर पहुंचते हैं। वसुधारा लगभग 400 फीट की ऊंचाई से गिरती है। इस झरने का पानी मोतियों की फुहार जैसा प्रतीत होता है। ऐसा कहा जाता है कि इस धारा की जल बूंदें पापी के शरीर पर नहीं गिरती हैं।

माणा अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण इतना महत्वपूर्ण है। इस भारत-तिब्बत सीमा सुरक्षा बल का बेस उत्तराखंड के अंतिम माणा गांव में भी है। कुछ समय पहले तक यहां के युवाओं की सुरक्षा बल में भर्ती नहीं होती थी, लेकिन अब इन लोगों की भी सीमा सुरक्षा बल में भर्ती की जा रही है। उन्हें सहकारी समिति से हर माह राशन मिलता है। सभी के घरों में बिजली है और सभी को गैस कनेक्शन उपलब्ध कराया गया है। माणा गांव घूमने का सबसे अच्छा समय मई से अक्टूबर के बीच है। इस दौरान यहां हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। क्योंकि आमतौर पर इन्हीं दिनों बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलते हैं। भारत और चीन की सीमा पर स्थित इस गांव में प्रकृति का अनोखा नजारा देखने को मिलता है।

उत्तराखंड के आखिरी माणा गांव तक कैसे पहुंचे?

  • दिल्ली से माणा की दूरी: 550 KM
  • देहरादून माणा की दूरी: 350 KM
  • हरिद्वार की माणा की दूरी: 320KM
  • ऋषिकेश माणा की दूरी: 300 km

हरिद्वार और ऋषिकेश से सड़क मार्ग द्वारा माणा गांव पहुंचा जा सकता है। आप हरिद्वार तक रेल यात्रा से जा सकते हैं। यहां से माणा गांव की दूरी करीब 275 किलोमीटर है। माणा गांव जाने के लिए उत्तराखंड के हरिद्वार, देहरादून, ऋषिकेश आदि पर्यटन स्थलों से बस और टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं।

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